चरक: अंधविश्वास की काली सच्चाई पर करारा प्रहार
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4 स्टार)
बॉक्स ऑफिस के मसाला ट्रेंड से अलग हटकर फिल्म बनाना हमेशा जोखिम भरा होता है। ऐसे में निर्माता सुदीप्तो सेन की तारीफ करनी होगी, जो लगातार ऐसे विषयों पर फिल्में बना रहे हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं। उनकी पिछली फिल्म द केरल स्टोरी ने 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई के साथ-साथ दर्शकों और क्रिटिक्स से खूब सराहना बटोरी थी। हालांकि ऐसे विषयों के कारण उन्हें कई बार विरोध और धमकियों का भी सामना करना पड़ा है।
अब उनकी नई फिल्म “चरक” एक ऐसे विषय को उठाती है जिसे सेंसर बोर्ड से पास कराना भी मेकर्स के लिए आसान नहीं था। काफी रिसर्च और दस्तावेज़ पेश करने के बाद फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ मंजूरी मिली।
फिल्म की कहानी चरक उत्सव के इर्द-गिर्द घूमती है, जो करीब हजार साल पुरानी परंपरा है और बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा और झारखंड सहित दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। देवी काली और भगवान शिव की आराधना से जुड़ा यह उत्सव जहां आस्था का प्रतीक है, वहीं इसका एक अंधेरा पक्ष भी है—तांत्रिक प्रथाएं, अघोरी साधनाएं और अंधविश्वास।
कहानी एक छोटे से गांव में घटित होती है, जहां गरीब लोग अपनी मुश्किल जिंदगी के बीच चरक उत्सव की तैयारियों में लगे हैं। इसी गांव में पढ़ने वाले दो बच्चों के अचानक गायब हो जाने से कहानी में भय और रहस्य का माहौल बन जाता है।
फिल्म का क्लाइमेक्स दर्शकों को चौंका देता है और यह धारणा तोड़ देता है कि अंधविश्वास सिर्फ अनपढ़ लोगों में ही होता है।
अंजली पाटिल और साहिदुर रहमान ने मुख्य भूमिकाओं में बेहतरीन अभिनय किया है। सुब्रत दत्ता, शशि भूषण और नवनीश नील ने भी अपने किरदारों को प्रभावशाली बनाया है।
अगर आप सिनेमा में सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज की सच्चाई देखना चाहते हैं, तो “चरक” आपके लिए जरूर देखने लायक फिल्म है।