उत्तराखंड जनकल्याण समिति ने किया बसंत आयो रे उत्सव का रंगारंग भव्य कार्यक्रम
वसुंधरा। वसुंधरा सेक्टर 17 के कोणार्क एन्क्लेव में आज उत्तराखंड जनकल्याण समिति द्वारा बसंतोत्सव का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें सैकड़ों लोग उपस्थित रहें इस अवसर पर मसक बीन, दमुआ, ढोल नगाड़ों के साथ माँ नंदा देवी की डोली निकाली गई और नृत्य, काव्य पाठ और गायन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। छात्र-छात्राओं ने सबसे पहले सरस्वती वंदना के माध्यम से मां सरस्वती की पूजा की और गायत्री मन्त्र गाकर सभी की मंगल कामना के लिए प्रार्थना की। इस कार्यक्रम में बी०सी० लोहानी, पूरण सिंह कठैत, अर्जुन पवार, टी०आर० शर्मा, सागर रावत, सच्चिदानंद शर्मा, मनीष नौटियाल, स्वरूप सिंह, बबिता रावत, सत्येंद्र, दीपा चौहान व महानंदा शर्मा ने सक्रियता के साथ हिस्सा लिया।
बी०सी० लोहानी ने उपस्थित लोगों को संबोधित कर कहा कि वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है । मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है परन्तु वसंत पंचमी का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। इस दिन पर कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।
सच्चिदानंद शर्मा ने कहा कि राजा भोज का जन्मदिवस भी वसंत पंचमी को ही आता हैं। राजा भोज इस दिन एक बड़ा उत्सव करवाते थे जिसमें पूरी प्रजा के लिए एक बड़ा प्रीतिभोज रखा जाता था जो चालीस दिन तक चलता था। वसन्त पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”का जन्मदिवस भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें ‘महाप्राण’ कहते थे। ऐसा भी मानते है कि इस दिन जन्मे लोग कोशिश करे तो बहुत आगे जाते है।